इस दिन है श्रावण पुत्रदा एकादशी, जानें क्यों रखा जाता है ये व्रत और क्या है विधि |

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बड़ा ही महत्व बताया जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु की अराधना की जाती है। श्रावण मास में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से संतान सुख की प्राप्ति और संतान संबंधी सभी समस्याओं का निवारण होने की मान्यता है। इस साल ये व्रत 30 जुलाई को रखा जाएगा। दूसरा पुत्रदा एकादशी व्रत पौष माह में रखा जाता है।

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धार्मिक महत्व:

पुत्रदा एकादशी व्रत की दक्षिण भारत में विशेष महत्ता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से वाजपेयी यज्ञ के बराबर पुण्यफल की प्राप्ति होती है और संतान संबंधी कष्ट दूर हो जाते हैं। कहा ये भी जाता है कि जो निसंतान दंपति अगर पूरे तन, मन से इस व्रत को करें तो उन्‍हें संतान सुख अवश्‍य प्राप्त होता है। साथ ही इस व्रत को लेकर ये भी प्रचलित है कि जो कोई पुत्रदा एकादशी व्रत कथा पढ़ता या फिर सुनता है उसे स्‍वर्ग की प्राप्‍ति होती है।

पूजा मुहूर्त:

पंचांग अनुसार पुत्रदा एकादशी व्रत 30 जुलाई को रखा जाएगा। व्रत का पारण 31 जुलाई को सुबह 05:42 AM से 08:24 AM तक किया जा सकता है। पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय 10:42 PM है। एकादशी तिथि का प्रारम्भ 30 जुलाई को 01:16 AM बजे से होगा और इसकी समाप्ति 30 जुलाई को 11:49 PM बजे पर होगी।

व्रत विधि:

एकादशी व्रत निर्जला और जल के साथ भी किया जाता है। इसके अलावा ये व्रत फलाहार के साथ भी किया जा सकता है। व्रत रखने वालों को दशमी की तिथि से ही सात्विक आहार खाना चाहिए। ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन भी करना चाहिए। व्रत के दिन सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु की पूजा करें। रात में भजन-कीर्तन करते हुए जगे रहें। उसके बाद द्वादशी के दिन के सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त में एक बार फिर से विष्णु जी पूजा करें। फिर किसी भूखे व्यक्ति या ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके बाद अपना व्रत खोल लें।

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पूजा विधि:

व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर भगवान विष्‍णु का स्‍मरण करें। फिर स्‍नान कर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें। घर के मंदिर में श्री हरि विष्‍णु की मूर्ति के सामने दीपक जलाएं और व्रत का संकल्‍प लें। अब भगवान विष्‍णु को नैवेद्य और फलों का भोग लगाएं। विष्णु पूजा में तुलसी का प्रयोग जरूर करें। श्री हरि विष्‍णु को धूप-दीप दिखाकर विधिवत पूजा करें और आरती उतारें। पूरे दिन निराहार रहें। शाम के समय पूजा कर कथा सुनने के बाद फलाहार ग्रहण करें। रात्रि के समय जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें। अगले दिन द्वादश तिथि को ब्राह्मणों को खाना खिलाएं और यथा सामर्थ्‍य दान दें। अंत में खुद भी भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें।

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